सड़क नहीं, जंगल की पगडंडी; 40 गांवों का सफर दुश्वारबदहाल मेगूर-यडगुंद मार्ग।

मेगूर-यडगुंद मार्ग बदहाल; बारिश में वाहन तो दूर, पैदल चलना भी मुश्किल

चिक्कमगलूरु। कच्ची पगडंडी जैसी सडक़, जगह-जगह गड्ढे और कई हिस्सों में सडक़ का नामोनिशान तक नहीं। वाहन चलाना तो दूर, पैदल गुजरना भी मुश्किल है। यह दुर्दशा कोप्पा तालुक के मेगूर-यडगुंद मार्ग की है, जहां करीब 40 गांवों और आसपास की बस्तियों के लोगों को रोजाना परेशानी झेलनी पड़ रही है।

गडिकल्लु कूडिग़े से मेगूर तक सडक़ की स्थिति अपेक्षाकृत ठीक है, लेकिन मेगूर से यडगुंद, बुक्कडिबैलु, कित्तलेगुळे सहित कई गांवों को जोडऩे वाली सडक़ बेहद खराब है। मेगूर से कुछ दूरी आगे बढ़ते ही गड्ढों से भरी सडक़ शुरू हो जाती है। आगे हालात ऐसे हैं कि गड्ढे भी नहीं, बल्कि सडक़ ही गायब नजर आती है।

बारिश में बढ़ जाती है परेशानी

पहले मौजूद पगडंडी को थोड़ा चौड़ा कर दिया गया है, लेकिन इसे सडक़ का स्वरूप नहीं दिया गया। जंगल के बीच से गुजरने वाले इस रास्ते पर नए व्यक्ति को ऐसा महसूस होता है मानो वह जंगल में फंस गया हो। बारिश के दिनों में स्थिति और विकट हो जाती है। ग्रामीणों के अनुसार, कार से यडगुंद जाने पर रास्ते में फंसने का खतरा बना रहता है।

यडगुंद में गौड्लु आदिवासी समुदाय के लोग रहते हैं। उनके लिए बाजार या आसपास के प्रमुख गांवों तक पहुंचना भी किसी चुनौती से कम नहीं है। निजी जीप और दोपहिया वाहनों के अलावा अन्य वाहनों का यहां पहुंचना मुश्किल है।

बच्चों की पढ़ाई भी प्रभावित

ग्रामीणों ने बताया कि बच्चों को स्कूल पहुंचाने और वापस लाने की जिम्मेदारी भी अभिभावकों पर है। कई माता-पिता दिन का काफी समय इसी काम में लगा देते हैं। अधिकांश परिवार मजदूरी पर निर्भर हैं, इसलिए कई लोगों ने बच्चों को छात्रावासों में भेज दिया है।

‘हर दिन वनवास जैसा जीवन’

गांव के युवक चेतन ने कहा कि जिन लोगों के पास अपना वाहन नहीं है, उनके लिए गांव से बाहर निकलकर शहर तक पहुंचना बेहद कठिन है। मेगूर से यडगुंद की दूरी करीब 8 किलोमीटर है, लेकिन सडक़ नहीं होने के कारण यह दूरी बेहद कठिन सफर में बदल जाती है।

उन्होंने कहा कि हम रोजाना वनवास जैसा जीवन जी रहे हैं। सडक़ और बिजली की सुविधा के लिए कई बार गुहार लगा चुके हैं। बारिश के दिनों में हमारी हालत और खराब हो जाती है। समझ नहीं आता कि अपनी समस्या किसके सामने रखें।

 

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By Bharat Ki Awaz

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