पुत्तूर की आराध्या आल्वा ने 21 सूक्ष्म वन्य पुष्पों का दस्तावेजीकरण कर पेश की मिसाल
पुत्तूर (दक्षिण कन्नड़). जहां अधिकांश बच्चे गर्मी की छुट्टियां खेलकूद और मनोरंजन में बिताते हैं, वहीं पुत्तूर की एक छात्रा ने प्रकृति के बीच रहकर दुर्लभ और सूक्ष्म जंगली फूलों पर अध्ययन कर एक प्रेरणादायक उदाहरण प्रस्तुत किया है।
सेंट विक्टर्स गल्र्स इंग्लिश मीडियम स्कूल की 10वीं कक्षा की छात्रा सवणूर के निकट पुण्चप्पाडी निवासी आराध्या एस. आल्वा ने छुट्टियों के दौरान आसपास के जंगलों और पहाडिय़ों में मिलने वाले 21 प्रकार के सूक्ष्म वन्य पुष्पों का अध्ययन कर “टाइनी वाइल्ड फ्लावर्स” नामक पुस्तक तैयार की है।
आराध्या, विवेक एस. आल्वा और स्मिता विवेक की पुत्री हैं। उनके पिता डिजाइनिंग क्षेत्र से जुड़े हैं, जबकि उनकी माता वनस्पति विज्ञान की व्याख्याता हैं। माता-पिता ने बच्चों को मोबाइल और टीवी से दूर रखकर प्रकृति से जोडऩे के उद्देश्य से यह विशेष कार्य दिया था, जिसे आराध्या ने चुनौती के रूप में स्वीकार किया।
लगभग दो महीनों तक उन्होंने जंगलों और प्राकृतिक क्षेत्रों में घूमकर सूक्ष्म फूलों की खोज की। इनमें से कई फूल इतने छोटे हैं कि सामान्यत: लोगों की नजर में नहीं आते। आराध्या ने इन फूलों की तस्वीरें खींचीं और अपनी मां की सहायता से उनके सामान्य नाम, वैज्ञानिक जानकारी, प्रजाति और अन्य विवरण संकलित किए।
खुद किया डिजाइन और दस्तावेजीकरण
कंप्यूटर और ग्राफिक डिजाइनिंग में रुचि रखने वाली आराध्या ने पुस्तक का लेआउट और पृष्ठ डिजाइन भी स्वयं तैयार किया। पुस्तक में शामिल फूलों की तस्वीरें उनके रंग, संरचना और प्राकृतिक सौंदर्य को आकर्षक ढंग से प्रस्तुत करती हैं।
कुछ फूल केवल रात में खिलते हैं, इसलिए आराध्या ने रात के समय भी फोटोग्राफी की। वहीं कुछ फूल सुबह या शाम के समय खिलते हैं, जिन्हें अलग-अलग समय पर जाकर कैमरे में कैद किया गया।
अब दूसरे भाग की तैयारी
आराध्या का कहना है कि फिलहाल 21 प्रकार के फूलों का संकलन कर पुस्तक का पहला भाग तैयार किया गया है। वर्षा ऋतु के बाद और भी कई वन्य पुष्प दिखाई देंगे। उनका अध्ययन कर पुस्तक का दूसरा भाग प्रकाशित करने की योजना है।
आराध्या के पिता विवेक आल्वा ने बताया कि उनकी बेटी को बचपन से ही प्रकृति में विशेष रुचि है। पांचवीं कक्षा में पढ़ते समय भी उसने कीट-पतंगों पर अध्ययन किया था। बच्चों को प्रकृति से जोडऩे के उद्देश्य से दिया गया यह कार्य अब एक प्रेरणादायक उपलब्धि में बदल गया है।
आराध्या की यह पहल न केवल पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाती है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि सही मार्गदर्शन और जिज्ञासा से विद्यार्थी कम उम्र में भी उल्लेखनीय शोध कार्य कर सकते हैं।
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