वाड़ी (कलबुर्गी)। चित्तापुर तालुक के लाडलापुर गांव में पहुंचते ही यदि कोई पूछे, “किसके घर जाना है?”, तो यह सामान्य बात है। लेकिन किसी व्यक्ति को ढूंढने पर अगला सवाल होता है—”कौन साबण्णा? कौन साबम्मा?” इसकी वजह है गांव की अनोखी परंपरा। करीब 8 हजार की आबादी वाले इस गांव में 2 हजार से अधिक लोगों के नाम साबण्णा या साबम्मा हैं।
गांव के लगभग हर घर में छोटे साबण्णा, बड़े साबण्णा, छोटी साबम्मा और बड़ी साबम्मा मिल जाएंगे। दादा-दादी से लेकर बच्चों और पोते-पोतियों तक एक ही नाम की परंपरा दिखाई देती है। गांव में केवल नाम लेकर पुकारने पर कई लोग पलटकर देखते हैं, इसलिए पहचान के लिए परिवार का उपनाम या ‘छोटे-बड़े’ जैसे संबोधन जोडऩे पड़ते हैं।
नई पीढ़ी के युवा दंपती भी अपने माता-पिता और दादा-दादी के नाम की परंपरा कायम रखने के लिए बच्चों के नाम साबण्णा और साबम्मा रख रहे हैं। ग्रामीणों के अनुसार यह परंपरा पिछले तीन-चार पीढिय़ों से चली आ रही है।
किसी एक जाति तक सीमित नहीं
इस परंपरा की सबसे खास बात यह है कि साबण्णा-साबम्मा नाम किसी एक जाति या समुदाय तक सीमित नहीं हैं। कोली कब्बलिग, कुरुबा, लिंगायत, बेड़ तथा दलित समुदायों के अलग-अलग वर्गों सहित गांव के लगभग हर समुदाय में ये नाम प्रचलित हैं।
सूफी संत की स्मृति से जुड़ी परंपरा
गांव के बाहरी हिस्से में ऊंची चट्टानी पहाड़ी पर हाजी सरवर दरगाह स्थित है। हिंदू श्रद्धालु इसे श्रद्धा से हादी शरण कहते हैं। हर वर्ष गर्मियों की दवन पूर्णिमा के बाद गुरुवार को यहां भव्य मेला लगता है, जिसमें हजारों श्रद्धालु पहुंचते हैं।
ग्रामीणों में प्रचलित मान्यता के अनुसार, कई वर्ष पहले सूफी संत हाजी साहब भ्रमण करते हुए इस पहाड़ी के पास पहुंचे थे। वहां मौजूद एक हिंदू और एक मुस्लिम युवक से उन्होंने क्रमश: पानी और दूध मांगा, ग्रहण किया और दोनों को आशीर्वाद देने के बाद पहाड़ी के पीछे अदृश्य हो गए। इसके बाद संत की स्मृति और श्रद्धा के प्रतीक के रूप में बच्चों के नाम साबण्णा और साबम्मा रखने की परंपरा विकसित हुई।
गांव के प्रमुख शांतिकुमार एण्णी, साबण्णा गोडग, मल्लण्णा दंडबा, ईरण्णा मल्कंडी, साबण्णा मुसला, मल्लिकार्जुन गांधी और साबण्णा आनेमी ने इस परंपरा के बारे में जानकारी दी।
पहचान में परेशानी नहीं, गर्व
आधार कार्ड, स्कूल के रिकॉर्ड और डाक पते में पिता का नाम, मकान नंबर और जन्मतिथि जैसी जानकारी विस्तार से दर्ज करनी पड़ती है। एक जैसे नाम होने के कारण कभी-कभी प्रशासनिक स्तर पर पहचान में परेशानी होती है। इसके बावजूद ग्रामीण इसे परेशानी नहीं, बल्कि अपने गांव की विशिष्ट पहचान मानते हैं।
जाति और धर्म के नाम पर बढ़ती सामाजिक दूरियों के बीच लाडलापुर में अलग-अलग समुदायों के लोगों का एक ही नाम की परंपरा से जुडऩा साम्प्रदायिक सौहार्द और सामाजिक एकता की अनोखी मिसाल है।
हर समुदाय में यही नाम
करीब 8 हजार की आबादी वाले लाडलापुर में 2 हजार से अधिक लोग साबण्णा या साबम्मा नाम से पहचाने जाते हैं। हाजी सरवर यानी हादी शरण दरगाह के सूफी संत के प्रति श्रद्धा के प्रतीक के रूप में तीन-चार पीढिय़ों से चली आ रही यह परंपरा आज भी कायम है। कोली कब्बलिग, कुरुबा, लिंगायत, बेड़ और दलित समुदायों के विभिन्न वर्गों सहित गांव के सभी समुदायों ने इस परंपरा को अपनाया है।
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