एंडोसल्फान त्रासदी के शिकार हजारों परिवार आज भी मोहताज
आलंकार में प्रस्तावित स्थायी पुनर्वास केंद्र बना छलावा
उप्पिनंगडी (दक्षिण कन्नड़)। दक्षिण कन्नड़, उडुपी और उत्तर कन्नड़ जिलों के एंडोसल्फान पीडि़तों और उनके परिवारों की पीड़ा वर्षों बाद भी खत्म नहीं हुई है। 1987 से 2001 के बीच काजू के पेड़ों को नुकसान पहुंचाने वाले कीटों को नियंत्रित करने के लिए हेलीकॉप्टरों से एंडोसल्फान का छिडक़ाव किया गया था। इसके दुष्परिणामस्वरूप काजू बागानों वाले क्षेत्रों में रहने वाली आबादी में गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं सामने आने लगीं।
पीडि़तों में बौद्धिक अक्षमता, शारीरिक विकलांगता, असामान्य शारीरिक विकास, मानसिक बीमारी, दृष्टि संबंधी समस्या, स्त्री रोग और बांझपन जैसी अनेक समस्याएं देखी गईं। उस समय बच्चे रहे अनेक पीडि़त आज वयस्क हो चुके हैं, लेकिन अब भी माता-पिता या परिजनों की देखभाल पर निर्भर हैं।
एक-एक परिवार की अपनी पीड़ा
कडबा तालुक के आलंकाऱ गांव के बुड़ेरिया निवासी राजीवी पूजारी के तीन बच्चे हैं, जिनमें दो जुड़वां हैं। इनमें से दिनेश का छह महीने पहले निधन हो गया। परिवार के मुखिया सुंदन पूजारी स्वयं हृदय संबंधी बीमारी से जूझ रहे हैं। ऐसे अनेक परिवार हैं, जहां बीमारी, आर्थिक संकट और देखभाल की जिम्मेदारी ने जीवन मुश्किल बना दिया है।
दशक पहले मिला था पुनर्वास का भरोसा
दक्षिण कन्नड़ के कडबा तालुक के अलंकार में एंडोसल्फान पीडि़तों के लिए स्थायी पुनर्वास केंद्र बनाने का सरकारी आश्वासन अब तक पूरा नहीं हुआ है। केंद्र के लिए पांच एकड़ जमीन आरक्षित किए जाने के बावजूद निर्माण कार्य शुरू नहीं हुआ।
पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धरामय्या के पहले कार्यकाल में प्रत्येक प्रभावित जिले में स्थायी पुनर्वास केंद्र स्थापित करने की घोषणा की गई थी। तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री रहे यू.टी. खादर ने अलंकार पहुंचकर आरक्षित जमीन का निरीक्षण किया था और एक वर्ष के भीतर केंद्र शुरू करने का आश्वासन दिया था। लेकिन एक दशक से अधिक समय बीतने के बावजूद यह वादा पूरा नहीं हुआ।
इससे पहले मुख्यमंत्री डी.वी. सदानंद गौड़ा के कार्यकाल में कोयिल और कोक्कड़ में अस्थायी देखभाल केंद्र शुरू किए गए थे, जो वर्तमान में सीमित स्तर पर डे-केयर सेंटर के रूप में संचालित हो रहे हैं।
पीडि़तों की प्रमुख मांगें
पीडि़तों की मांग है कि तीनों जिलों में स्थायी पुनर्वास केंद्र स्थापित किए जाएं। 60 प्रतिशत से अधिक विकलांगता वाले लोगों की मासिक पेंशन 4 हजार से बढ़ाकर 6 हजार रुपए और 60 प्रतिशत से कम विकलांगता वालों की पेंशन 2 हजार से बढ़ाकर 4 हजार रुपए की जाए।
बिस्तर पर पड़े पीडि़तों के माता-पिता को 5 हजार रुपए मासिक सहायता दी जाए। केंद्र सरकार से अब तक मुआवजा नहीं मिलने के कारण राज्य सरकार को केंद्र के समक्ष प्रस्ताव भेजना चाहिए। बिस्तर पर पड़े तथा मृत एंडोसल्फान पीडि़तों के परिवारों को 10-10 लाख रुपए मुआवजा देने की भी मांग की गई है।
एंडो पीडि़तों के अनुसार कुल मिलाकर करीब 80 प्रतिशत लोग बिस्तर पर हैं और उन्हें निरंतर देखभाल की आवश्यकता है।
दक्षिण कन्नड़ जिला एंडो विरोधी संघर्ष समिति के अध्यक्ष पीर मोहम्मद साहेब ने कहा कि एंडो पीडि़तों के लिए स्थायी पुनर्वास केंद्र स्थापित कराने का संघर्ष जारी है। सरकार को तत्काल संवेदनशीलता दिखाकर पीडि़तों को न्याय देना चाहिए।
वर्षों से लंबित पुनर्वास केंद्र और आर्थिक सहायता की मांग अब भी सरकारी फाइलों में अटकी है। पीडि़त परिवारों को उम्मीद है कि सरकार अब केवल आश्वासन नहीं, बल्कि ठोस कार्रवाई करेगी।
तीनों जिलों में हजारों पीडि़त
जिला — कुल पीडि़त – 100प्रतिशत विकलांग – 60 प्रतिशत विकलांग – 25 प्रतिशत विकलांग – मृतक
दक्षिण कन्नड़ – 3,762 – 774 – 2,301 – 568 – 119
उडुपी – 1,513 – 807 – 487 – 219 – 50+
उत्तर कन्नड़ – 1,831 – 1,082 – 744 – 50
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