पश्चिमी घाट की पहाड़ियां रोकती हैं मानसूनी बादल, जबकि बंगाल की खाड़ी की प्रणाली सूखे इलाकों तक पहुंचाती है वर्षा; इस बार सामान्य से कम बारिश की आशंका
बेंगलूरु। कर्नाटक में बारिश का वितरण प्रकृति की एक अनोखी वैज्ञानिक व्यवस्था को दर्शाता है। राज्य के कुछ हिस्सों में जहां सालाना 4,000 मिमी से अधिक वर्षा होती है, वहीं कुछ जिलों में यह आंकड़ा 400 से 600 मिमी तक सीमित रह जाता है। इस असमानता के पीछे पश्चिमी घाट, मानसूनी हवाएं और बंगाल की खाड़ी में बनने वाली मौसम प्रणालियां प्रमुख कारण हैं।
पश्चिमी घाट और मानसून की टक्कर
जून में अरब सागर से नमी लेकर आने वाली दक्षिण-पश्चिम मानसूनी हवाएं जब पश्चिमी घाट की ऊंची पर्वत श्रृंखलाओं से टकराती हैं, तो ऊपर उठने को मजबूर हो जाती हैं। ऊंचाई पर पहुंचकर हवा ठंडी होती है और उसमें मौजूद नमी वर्षा के रूप में बरस जाती है। इस प्रक्रिया को वैज्ञानिक भाषा में ओरोग्राफिक वर्षा (भूरूपीय वर्षा) कहा जाता है।
इसी कारण मेंगलूरु, उडुपी, कारवार, सिरसी और कोडगु जैसे क्षेत्रों में भारी वर्षा होती है। अगुम्बे में कई बार 7,000 मिमी से अधिक वर्षा दर्ज की गई है, इसलिए उसे ‘दक्षिण भारत का चेरापूंजी’ कहा जाता है।
वर्षा-छाया क्षेत्र में सूखे की चुनौती
पश्चिमी घाट पार करने के बाद मानसूनी हवाएं नमी खो देती हैं। नीचे उतरते समय वे गर्म और शुष्क हो जाती हैं। इस प्रभाव को फोएन प्रभाव कहा जाता है। इसके परिणामस्वरूप तुमकूरु, चित्रदुर्ग, दावणगेरे, गदग, कोप्पल, विजयपुर, रायचूर, यादगीर और कलबुर्गी जैसे जिले वर्षा-छाया क्षेत्र में आ जाते हैं।
इन क्षेत्रों में वार्षिक वर्षा 400 से 600 मिमी के बीच रहती है, जिससे खेती पूरी तरह मानसून पर निर्भर रहती है।
बंगाल की खाड़ी बनती है जीवनदायिनी
जून से अक्टूबर के बीच बंगाल की खाड़ी में बनने वाले निम्न दबाव क्षेत्र और अवदाब (डिप्रेशन) सूखे इलाकों के लिए राहत लेकर आते हैं। ये प्रणालियां ओडिशा, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना होते हुए कर्नाटक के आंतरिक भागों तक पहुंचती हैं और कई बार कुछ ही दिनों में महीनेभर की वर्षा करा देती हैं।
रायचूर, कोप्पल, बीदर, कलबुर्गी और यादगीर जैसे जिलों को अक्सर इसी प्रणाली से महत्वपूर्ण वर्षा प्राप्त होती है। बेंगलूरु और मैसूरु में भी अक्टूबर-नवंबर के दौरान पूर्वोत्तर मानसून के समय इसका प्रभाव दिखाई देता है।
तीन भागों में बंटा है वर्षा का स्वरूप
कर्नाटक को वर्षा के आधार पर तीन क्षेत्रों में विभाजित किया जा सकता है। पहला, तटीय और मलनाड क्षेत्र जहां 2,000 से 4,000 मिमी तक वर्षा होती है। दूसरा, मध्य कर्नाटक जहां 700 से 1,200 मिमी तक बारिश दर्ज होती है। तीसरा, उत्तर और कल्याण कर्नाटक का शुष्क क्षेत्र, जहां वर्षा अपेक्षाकृत कम होती है।
इस वर्ष कम बारिश की आशंका
वरिष्ठ वैज्ञानिक चनबसनगौड़ा एस. पाटील के अनुसार, इस वर्ष कर्नाटक में सामान्य से कम वर्षा होने की संभावना है। जून में मानसून समय पर पहुंचा, लेकिन जुलाई और अगस्त में वर्षा की तीव्रता घट सकती है। इसके पीछे प्रशांत महासागर में विकसित हो रही एल नीनो जैसी वैश्विक जलवायु परिस्थितियों को प्रमुख कारण माना जा रहा है।
कृषि विभाग ने किसानों को मिट्टी की नमी का संरक्षण करने तथा मौसम पूर्वानुमानों पर विशेष ध्यान देने की सलाह दी है। वहीं, कोडगु, चिक्कमगलूरु और सकलेशपुर जैसे पर्यटन स्थलों की यात्रा करने वाले लोगों से भी मौसम संबंधी चेतावनियों का पालन करने का आग्रह किया गया है।
– चनबसनगौड़ा एस. पाटील, वरिष्ठ वैज्ञानिक, भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी)
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